आईए जानते हैं ब्लैक फॉरेस्ट केक की दिवस के बारे में।
शिवाक्ष शर्मा।
ब्लैक फॉरेस्ट लगभग हर किसी की पहली पसंद है, इसका लाजबाव टेस्ट सभी को लुभा लेता है. इसके नाम के पिछे भी दिलचस्प कहानियां हैं। ऐसा माना जाता है कि इस केक का पता 1500 के दशक में लगाया गया था, जब यूरोप में पहली बार चॉकलेट उपलब्ध हुई थी। कहा जाता है कि इसे जर्मनी के ब्लैक फ़ॉरेस्ट में बनाया गया था, जो अपनी खट्टी चेरी और किर्शवासेर (चेरी से बनी एक ब्रांडी) के लिए जाना जाता है।
एक दूसरी कहानी ये भी है कि केक को ‘ब्लैक फॉरेस्ट’ इसलिए नहीं कहा जाता क्योंकि इसे वहां बनाया गया था, बल्कि इसलिए क्योंकि केक में इस्तेमाल की गई चेरी पारंपरिक जर्मन टोपियों पर लगे लाल पोम-पोम जैसी दिखती है, इसलिए इसका नाम भी ब्लैक फॉरेस्ट रखा गया था. हालांकि माना ये भी जाता है कि ‘ब्लैक फॉरेस्ट’ नाम अंधेरे, छायादार जंगल का प्रतीक है, जो सच भी लगता है।
केक की उत्पत्ति की कहानियों में जोसेफ केलर नामक एक हलवाई ने दावा किया है कि उन्होंने 1915 में इसका आविष्कार किया था। केलर के दावों की कभी पुष्टि नहीं हुई, लेकिन यह स्थापित हो गया है कि जिस संस्करण को वह परोस रहे थे, उसने मिठाई को लोकप्रिय बनाने में मदद की।
इसके तुरंत बाद, ब्लैक फ़ॉरेस्ट केक ब्रिटेन में पहुँच गया। हालाँकि उस समय केक का नाम बदलकर ब्लैक फ़ॉरेस्ट गेटो कर दिया गया। 1970 के दशक तक यह एक पसंदीदा व्यंजन बन गया था, 1970 और 1980 के दशक में रेस्तरां और पार्टियों में मिठाई के मेनू में दिखाई दिया।
डिजिटल बाल मेला की शुरुआत जयपुर के महाराजा सवाई मानसिंह विद्यालय की छात्रा जान्हवी शर्मा द्वारा की गई थी। इसके तहत अभी तक कई अभियानों का आयोजन किया जा चुका है जिसमें “बच्चों की सरकार कैसी हो?” “मैं भी बाल सरपंच” “कौन बनेगा लोकतंत्र प्रहरी” “म्यूजियम थ्रू माय आइज” आदि शामिल हैं।
वर्तमान में डिजिटल बाल मेला द्वारा बच्चों के लिए “कौन बनेगा बाल पार्षद” अभियान चलाया जा रहा है। जिसकी विस्तृत जानकारी आप डिजिटल बाल मेला की वेबसाइट एवं व्हाट्सऐप चैनल पर ले सकते हैं।
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