धूमधाम से मनाया गया राजस्थान स्थापना दिवस…

धूमधाम से मनाया गया राजस्थान स्थापना दिवस।

शिवाक्ष शर्मा।

राजस्थान कल अपना 76वां स्थापना दिवस मनाया गया . सरकार ने इस खास दिवस के लिए ऐतिहासिक निर्णय लिया है, इस दिन को चैत्र शुल्क प्रतिपदा को मनाने का निर्णय लिया गया है. जो कि हमारी सांस्कृतिक विरासत को पुनर्स्थापित करने वाला कदम निर्णय है.

राजस्थान की स्थापना चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को 30 मार्च 1949 को हुई थी. आजादी से पहले यह प्रदेश राजपूताना नाम से जाना जाता था. 19 रियासतों एकजुट कर प्रदेश के रूप में स्थापित करने की योजना बनाई. राजस्थान का एकीकरण 7 चरणों में संपन्न हुआ था.
एकीकरण के चौथे चरण में संयुक्त राजस्थान व जयपुर, जोधपुर, बीकानेर,जैसलमेर रियासतों को मिलाकर वृहद राजस्थान का निर्माण किया गया. सरदार वल्लभ भाई पटेल ने वृहद राजस्थान का उद्घाटन किया था.
स्थापना दिवस विशेष :
राजस्थान की स्थापना चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के दिन हुई. पहली बार ऐसा मौका आया जब हिंदी नव वर्ष कैलेंडर के मुताबिक स्थापना दिवस मनाया जाता है।

राजस्थान, जिसे ‘राजाओं की भूमि’ के नाम से जाना जाता है. इसका इतिहास गौरवशाली परंपराओं, शौर्य और सांस्कृतिक समृद्धि से भरा हुआ है. इस धरती पर कदम रखते ही इतिहास की अनुगूंज सुनाई देती है, जहां हर किला, हर महल और हर गली अतीत की कहानियां बयां करती है, लेकिन इस गौरवशाली राज्य का वर्तमान स्वरूप एक लंबी और जटिल प्रक्रिया का परिणाम है, जिसमें राजपूताना की 22 रियासतों का एकीकरण, नामकरण और सांस्कृतिक पुनर्जागरण शामिल है.

राजस्थान का एकीकरण केवल राजनीतिक बदलाव नहीं था, बल्कि यह एक सांस्कृतिक और सामाजिक आंदोलन था, जिसने विविध संस्कृतियों, परंपराओं और रियासतों को एक सूत्र में पिरोया. इस ऐतिहासिक यात्रा की शुरुआत उस समय हुई जब भारत की आजादी के बाद विभिन्न रियासतों को भारतीय संघ में शामिल करने की प्रक्रिया शुरू हुई. इसे अंजाम देने में सरदार वल्लभभाई पटेल की महत्वपूर्ण भूमिका रही. ऐसा पहली बार है जब राजस्थान सरकार की ओर से हिंदी नव वर्ष कैलेंडर के मुताबिक स्थापना दिवस मनाया गया।

राजस्थान के एकीकरण की ऐतिहासिक गाथा

इतिहासकार राजवीर सिंह चलकोई बताते हैं कि राजस्थान का वर्तमान स्वरूप कई दौर की ऐतिहासिक प्रक्रियाओं से गुजरा है. राजस्थान के एकीकरण का चौथा दौर जब पूरा हुआ, तब इसमें मुख्य रूप से चार बड़ी रियासतें जयपुर, जोधपुर, बीकानेर और जैसलमेर शामिल की गईं. इस ऐतिहासिक अवसर के उद्घाटन समारोह में देश के लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल के आने की संभावना थी. इसे यादगार बनाने के लिए तत्कालीन जयपुर महाराजा सवाई मानसिंह द्वितीय ने चैत्र शुक्ल प्रतिपदा का दिन चुना. उनका मानना था कि जैसे पतझड़ के बाद नई ऋतु का आगमन होता है, वैसे ही यह दिन राजस्थान के नए युग की शुरुआत का प्रतीक बनेगा.

डिजिटल बाल मेला की शुरुआत जयपुर के महाराजा सवाई मानसिंह विद्यालय की छात्रा जान्हवी शर्मा द्वारा की गई थी। इसके तहत अभी तक कई अभियानों का आयोजन किया जा चुका है जिसमें “बच्चों की सरकार कैसी हो?” “मैं भी बाल सरपंच” “कौन बनेगा लोकतंत्र प्रहरी” “म्यूजियम थ्रू माय आइज” आदि शामिल हैं।

वर्तमान में डिजिटल बाल मेला द्वारा बच्चों के लिए “कौन बनेगा बाल पार्षद” अभियान चलाया जा रहा है। जिसकी विस्तृत जानकारी आप डिजिटल बाल मेला की वेबसाइट एवं व्हाट्सऐप चैनल पर ले सकते हैं।

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