बिहार के सैयद फरहान हैदर ने रखे साक्षरता दिवस पर अपने विचार

परिवर्तनशील दुनिया के लिए साक्षरता को बढ़ावा देना है जरुरी

बाल लेखक- सैयद फरहान हैदर

{ अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस }

ए. पी.जे. अब्दुल कलाम ने कहा था कि शिक्षा देश की प्रगति और विकास के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण तत्व है और आज यह बात निस्संदेह ही सच है। शिक्षा सिर्फ़ हमे स्कूल में विज्ञान ,गणित और साहित्यक जैसे विषयों का ही ज्ञान नहीं देती ब्लकि जीवन को आसान भी बनाती है, समाज की अहम समस्याओं से अवगत करा कर उनके समाधान को खोजने में भी मदद करती है। शिक्षा के इसी महत्व के बारे मे लोगों को जागरूक करने के लिए ही यूनेस्को ने अक्टूबर 1966 को अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस मनाने की घोषणा की और 8 सितंबर 1967 में पहली बार इसे मनाया गया। इसका उद्देश्य पूरे विश्व के लोगों को शिक्षा के प्रति जागरूक करना है। हर साल इसे एक विशेष विषय पर मनाया जाता है इस साल का विषय “परिवर्तनशील दुनिया के लिए साक्षरता को बढ़ावा देना, टिकाऊ और शांतिपूर्ण समाजों की नींव का निर्माण करना” है। प्रगतिशील अर्थव्यवस्था और बेहतर समाज का सपना शिक्षा के बिना साकार नहीं हो सकता है। शिक्षा ने ही मानव सभ्यता को आज इस स्तर पर पहुंचाया है।

विश्व की प्रगति शिक्षा के साथ ही हुई है।
साल 1951 में जहाँ वैश्विक साक्षरता दर महज़ 18.33 % थी वही आज यह बढ़  कर पुरुषों में 86.3% और महिलाओं में 82.7% हो चुकी है। साक्षरता दर में वृद्धि की वज़ह से ही हम आज एक महान सभ्यता बन पाये है और एक उज्जवल भविष्य की कामना कर सकते हैं।
भारत की आजादी के समय यहाँ की साक्षरता दर महज़ 12% ही थी मगर हम सब के प्रयासों से आज भारत की साक्षरता दर पुरुषों में 84.70% और महिलाओं में 70.30% हो चुकी है , और यह हमारे लिए एक महान उपलब्धि है एक पुरुष के मुकाबले महिलाओं की साक्षरता दर में अन्तर का कारण समाज में फैली कुछ कुरीतियां है, जिनसे उबरने के लिए भी शिक्षा ही महत्त्वपूर्ण है।

मगर हम सिर्फ साक्षरता दर से ही देश के प्रगति को नहीं माप सकते। यह एक आश्चर्यजनक बात है, कि बड़े-बड़े पदों पर बैठे हुए लोग जो अपने आप को साक्षर कहते हैं, वे गरीब, अनपढ़ एवं पिछड़े लोगों का सम्मान करना भी नहीं जानते। यह कैसी साक्षरता है, जिसके होते हुए भी हम जात – पात का भ्रम पैदा करते हैं यह शर्म की बात है कि यह साक्षर दुनिया भी किसी के बातों में आ कर धर्म और प्रांत के लिए लड़ती  है और अपना नुकसान कर बैठती है। साक्षर होकर भी हम महिलाओं का सम्मान करना नहीं जानते। आज तो हर साक्षर इंसान पर्यावरण के महत्त्व को जानते हुए उसे अंधाधुंध नुकसान पहुंचा रहा है। ये सब समस्याएं इस वजह से हैं क्योंकि हमने ज्ञान को केवल किताबों में ही बंद कर दिया है और केवल किताबी ज्ञान पर ही केंद्रित हो गए हैं। साक्षरता समाज के मूल ज्ञान और शिष्टाचार के बिना अधूरी है। आज समाज को एक ऐसे व्यक्ति की आवश्यकता है जो समाज में आधुनिकता और पौराणिक संस्कृति में संतुलन बनाए रखे औरसामाज सुधार के प्रति जागरूक हो। हम आशा करते हैं की हम सब वो व्यक्ति बन बन पायें।” घर-घर अलख जगायेंगे, हम बदलेंगे ज़माना “

डिजिटल बाल मेला बच्चों के बीच जागरूकता पैदा करने और उनकी कला को प्रदर्शित करने के लिए एक मंच प्रदान करने के लिए बच्चों द्वारा स्थापित एक मंच है। डिजिटल बाल मेला सूचना प्रौद्योगिकी की शक्ति का उपयोग करके बच्चों को उनके रचनात्मक पक्ष को उजागर करने में मदद कर रहा है और इसे जबरदस्त प्रतिक्रिया मिली है।

आपको बता दें कि डिजिटल बाल मेले की शुरुआत 2020 में जयपुर की रहने वाली 10 साल की जान्हवी शर्मा ने की थी। डिजिटल बाल मेला अब तक कई अभियान चला चुका है जिनमें “राजस्थान विधानसभा बाल सत्र”, “हिमाचल प्रदेश विधानसभा बाल सत्र”, “मैं भी बाल सरपंच” आदि शामिल हैं।

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