टाबर संस्था के बच्चों ने नाटक के जरिए क्या दिया संदेश……
ओमप्रकाश ढाका।
अंतरराष्ट्रीय बाल दिवस 20 नवंबर 2023 के अवसर पर जवाहर कला केन्द्र के शिल्पग्राम में डिजिटल बाल मेला और यूनिसेफ द्वारा आयोजित Blue street & Ed talk में टाबर संस्था के बच्चों ने सड़क किनारे भीख मांगने वाले बच्चों की आवाज को अपनी आवाज़ और नाटक से सभी के सामने पेश किया। टाबर संस्था के बच्चों ने सड़क पर भीख मांगने वाले लाखों बच्चों के दर्द को नाटक के माध्यम से अपने शब्दों से प्रस्तुत किया।
सभी बच्चों ने एक सुर में कहा कि हम भी पढ़ना चाहते है।
शंकर : जब हम जन्म लेते है और होश संभालते है तो हमारे हाथ में ये होता है… भीख का कटोरा
लेखराज: सुना है इस उम्र मे हमारे हाथ मे किताब होती है लेकिन हमारे हाथ में है…. भीख का कटोरा
आकाश : सुना है इस उम्र मे बच्चे खेलते कूदते है लेकिन हमारे हाथ में है …. भीख का कटोरा
राहुल : जो बच्चे हम काम करते है हमारे लिए तो वही खेल है।
अजय: सुना है हम हँसते हँसते खेलते खेलते हम बच्चे सब सिख जाते है।
संदीप: पर हम बच्चो को भूख रोते रोते सब कुछ सिखा जाती है।
नवीन: सुना है इस उम्र मे बच्चे Nutrition के लिए फल सब्जिया, ड्राई Fruits खाते है और पूरी नींद लेते है।
जीतेन्द्र : Nutrition क्या होता है हमारा तो सिर्फ भूख से नाता है जिस दिन हमारा पेट भर जाता है उस दिन हमे नींद आ जाती है।
अभिषेक: जैसे – जैसे वो बच्चे बड़े होते है जिन्दगी जीने के कई रास्ते खुल जाते है
संजय : हमारे जैसे बच्चों की जिन्दगी धीरे धीरे ख़त्म होती जा रही है।
सभी बच्चे : जिन्दगी धीरे – धीरे ख़त्म होती जा रही है।
शंकर : जब हम जन्म लेते है तो होश संभालते है तो हमारे हाथ मे किताब होनी चाहिए लेकिन हमारे हाथ मे तो.. भीख का कटोरा… है।
शंकर : जहा दुनिया मेरे लिए बस घर से स्कूल का रास्ता था। वही एक बच्चा स्कूल जाने के लिए बहुत तरसता था
मैं आकाश मे उड़ना चाहता था।
मैं अपना जीवन जीना चाहता था।
लेकिन मेरे पंख काट दिए, अब मैं मजदूरी करता हूं। अब एक फैक्ट्री ही मेरे लिए स्कूल और खेलने का मैदान जैसा है। मैं रोज़ भूख से लड़ता हूं।
जीतेन्द्र : पढ़ने की जब थी इसकी उम्र पढ़ नहीं पाया माँ बाप ने निजी स्वार्थ के लिए इसे काम पर लगाया।
शंकर : मुझे काम पर लगाया
अजय: रह गया ये अंगूठा छाप अब करता है मजदूरी, पढ़ नहीं पाया क्या थी इसकी मज़बूरी।
राहुल : क्या थी मेरी मज़बूरी
अभिषेक : नन्ही अंगुलियों ने बीडी के धागे बांधे, भार उठाया उम्र से ज्यादा दर्द करते है इसके कंधे।
लेखराज: है दर्द करते है मेरे कंधे
संजय: बंद रोशनी में बनाता था रात गलीचे ये सुबह उठकर मालिक के बगीचे मे देता पानी।
शहंशाह : हां मैं देता था पानी
कपिल : सड़क पर करके ले जाता चाय की केतली यह जान बचाकर लड़ता ट्रैफिक से हर गली चौराहे पर बेचता चाय ये।
शिवम : हां हर गली चौराहे पर चाय मैं बेचता।
विनोद : आप भी ढाबे पर जाकर खाना खाते है, छोटू दे आवाज़ पानी इसे मंगवाते है, मेज पोछता ये, जब हाथ से रखी थाली से गलती से गिरता कुछ, फिर खाता ये गाली।
आकाश : हां में खाता गाली
यशपाल : रंग रसायन से की कपड़ो की छपाई, इसने झूटी प्लेट उठाकर अपनी भूख मिटाई।
संजय : हां झुटी प्लेट उठाकर मैंने भूख मिटाई।
(फिर दो बच्चे एक कपडा लेकर आते है जिस पर लिखा है… चाइल्ड लेबर…)
( बाकि बच्चे भी प्लेकार्ड पकड़े है जिन पर लिखा है … गरीबी, व्यापार, मजदूरी, डर, बचपन, आजादी, अधिकार, तस्करी, शोषण, अवैध, हिंसा, आतंक और गुलामी )
नवीन: आप सभी बच्चों के हाथ में किताब होगी लेकिन हमारे हाथ में है…. भीख का कटोरा…
सभी: आप सभी के बच्चो के हाथ मे किताब होगी लेकिन हमारे हाथ में है…भीख का कटोरा
सभी बच्चे : हमारे हाथ में है.. भीख का कटोरा…
शंकर : बच्चे काम करते दिखे तो 1098 पर कॉल करे और बचपन बचाए।
सभीबच्चे : बच्चों को बचाए।
लेखराज: हम भी इन हाथों से पढना चाहते है।
सभी बच्चे : हम भी इन हाथों से पढना चाहते है।
विजय : सरकार के प्रयासों से धीरे धीरे बाल मजदूरी कम होती जा रही है।
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