बाल लेखिका साक्षी
इतिहास
हजार से अधिक वर्षों तक त्रिपुरा के ‘त्रिपुरी शासक’ (184 राजा) थे और “कोलोमा” कोकबोरोक की लिपि थी। त्रिपुरा के राजाओं की ‘राजमाला’ क्रोनिकल गाथाओं में भी लिखा गया है कि राजमाला बंगाली से भी पहले कोकबोरक भाषा में लिखी गई थी। 1971 में बांग्लादेश से अवैध रूप से आये बांग्लादेशी शरणार्थियों ने त्रिपुरा के लोकतंत्र को बदल दिया और त्रिपुरा की भाषा बांग्ला बन गई। लेकिन कोकबोरक के अस्तित्व को बचाने के लिए कई आंदोलन किए गए।
अर्थ
कोक का अर्थ ‘भाषा’
बोरोक का अर्थ ‘लोग’ है।
यानी ‘लोगों की भाषा’।
कार्यक्रम
कोकबोरोक दिवस के दौरान कई कार्यक्रम होते हैं। इस दिन छात्र-छात्राओं को ‘कोकबोरोक’ के प्रति सम्मान शिक्षा दी जाती है। कोकबोरोक दिवस में सिर्फ रैली ही नहीं, बल्कि अलग-अलग स्कूलों-कॉलेजों के बच्चे बड़ी उत्साह से सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करते हैं। इन प्रोग्रामों में छात्र नाच गाकर भाग लेते हैं और कोकबोरोक कविता, किस्से-कहानियों का भी प्रदर्शन करते है।कोकबोरोक दिवस में और भी कई कार्यक्रम होते हैं।
धन्यवाद।
डिजिटल बाल मेला ने जनवरी माह के महत्वपूर्ण दिनों पर एक लेखन प्रतियोगिता का आयोजन किया है। प्रतियोगिता के अंत में जिस बच्चे की लेखन कला सबसे अच्छी होगी उसे 1100 रुपये का नकद पुरस्कार भी दिया जाएगा। आप भी इसमें भाग ले सकते हैं। आपके द्वारा लिखे गए लेख डिजिटल बाल मेला में भेजें। बाल लेखकों द्वारा लिखे गए आलेखों को डिजिटल बाल मेला की वेबसाइट पर पोस्ट किया जाएगा।
डिजिटल बाल मेला की शुरुआत कोरोना काल में बच्चों की बोरियत को दूर करने के लिए जयपुर के महाराजा सवाई मानसिंह विद्यालय की छात्रा जान्हवी शर्मा द्वारा की गई थी। इसके तहत अभी तक कई अभियानों का आयोजन किया जा चुका है जिसमें “बच्चों की सरकार कैसी हो?” “मैं भी बाल सरपंच” “कौन बनेगा लोकतंत्र प्रहरी” “म्यूजियम थ्रू माय आइज” आदि शामिल हैं।
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