आइए जानते हैं अजन्मे बच्चे का अंतर्राष्ट्रीय दिवस के बारे में।
शिवाक्ष शर्मा।
हर साल 25 मार्च को विश्वभर के कई देशों एवं संस्थानों में अंतरराष्ट्रीय अजन्मे बच्चे का दिवस मनाया जाता है। इस दिन की शुरुआत लोगों को अजन्मे बच्चे के अधिकार एवं महत्व के बारे में जागरूक करने के लिए की गई थी। इसके साथ ही इस दिन के ज़रिए गर्भपात की निंदा भी की जाती है ताकि अजन्मे बच्चे के अधिकारों को बचाया जा सके।
अजन्मे बच्चे का अंतर्राष्ट्रीय दिवस पहली बार 1999 में मनाया गया था। इसकी स्थापना पोप जॉन पॉल द्वितीय ने की थी, जिन्होंने अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से अजन्मे बच्चे सहित हर इंसान के जीवन के अधिकार को पहचानने और उसका सम्मान करने का आह्वान किया था। तब से, यह दिन दुनिया भर में कई संगठनों द्वारा मनाया जाता है।
यह दिन उन कई चुनौतियों की याद भी दिलाता है जिनका अजन्मे बच्चों को सामना करना पड़ता है, जैसे गर्भपात, उपेक्षा और दुर्व्यवहार। यह उन विभिन्न तरीकों पर विचार करने का समय है जिनसे हम अजन्मे बच्चों का समर्थन और सुरक्षा कर सकते हैं।
अजन्मे बच्चे का अंतर्राष्ट्रीय दिवस मनाने का महत्व लोगों को यह बताना है कि मानव अस्तित्व के हर चरण में जीवन अनमोल है और हमें इसकी रक्षा के लिए हर संभव उपाय करना चाहिए और गर्भपात हिंसा को समाप्त करना चाहिए।
डिजिटल बाल मेला ने मार्च माह के महत्वपूर्ण दिनों पर एक लेखन प्रतियोगिता का आयोजन किया है। प्रतियोगिता के अंत में जिस बच्चे की लेखन कला सबसे अच्छी होगी उसे 1100 रुपये का नकद पुरस्कार भी दिया जाएगा। आप भी इसमें भाग ले सकते हैं। आपके द्वारा लिखे गए लेख डिजिटल बाल मेला में भेजें। बाल लेखकों द्वारा लिखे गए आलेखों को डिजिटल बाल मेला की वेबसाइट पर पोस्ट किया जाएगा।
डिजिटल बाल मेला की शुरुआत कोरोना काल में बच्चों की बोरियत को दूर करने के लिए जयपुर के महाराजा सवाई मानसिंह विद्यालय की छात्रा जान्हवी शर्मा द्वारा की गई थी। इसके तहत अभी तक कई अभियानों का आयोजन किया जा चुका है जिसमें “बच्चों की सरकार कैसी हो?” “मैं भी बाल सरपंच” “कौन बनेगा लोकतंत्र प्रहरी” “म्यूजियम थ्रू माय आइज” आदि शामिल हैं।
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