जानिए विश्व ल्युपस दिवस के बारे मे हिमाचल प्रदेश की कशिश से।
बाल लेखिका कशिश।
दुनिया भर में 10 मई का दिन वर्ल्ड लुपुस डे के तौर पर मनाया जाता है।
इस दिन को मनाने का मकसद लोगों को इस बीमारी के प्रति जागरूक करना है, जिससे पुरुषों के मुकाबले महिलाएं ज्यादा प्रभावित होती है।
ध्यान दें लुपिस कोई ऐसी बीमारी नहीं है, जो छूने से फैलती है और ना ही यौन संबंध बनाने से बस यह बीमारी शरीर के जिस भी भाग पर होती है ,उसे पूरी तरह से डैमेज कर सकती है।
वर्ल्ड लुपस दे पहली बार 2004 में मनाया गया था। जिसकी शुरुआत लॉयोपस फाउंडेशन ऑफ़ अमेरिका ने दुनिया भर के लिए पास संगठनों के साथ साझेदारी में की थी।
तब से यह एक वैश्विक कार्यक्रम बन गया है, जिसमें लुपस वाले लोगों के लिए जागरुकता और समर्थन बढ़ाने के लिए विभिन्न संगठनों और समुदायों द्वारा गतिविधियों और कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।
लुपस एक ऑटोइम्यून बीमारी है जो शरीर के सेल्स और टिशूज को डैमेज करने का काम करती है। जिसके चलते हृदय ,फेफड़े ,जॉइंट्स ,स्किन ,दिमाग पर असर पड़ता है ।
लेकिन किडनी पर इसका ज्यादा प्रभाव पड़ता है। यह बीमारी आमतौर पर गर्भवती महिलाओं को ज्यादा प्रभावित करती है।
लुपस के सामान्य लक्षण ब्लड में प्लेटलेट्स की मात्रा कम हो जाना,
सांस लेने में परेशानी,
तेज बुखार या दस्त
थकान,
शरीर में दर्द ,
सर दर्द ,
बाल झड़ना ,
एनीमिया ,
बार-बार गर्भपात ,
जोड़ों का दर्द ,
सर में माइग्रेन जैसे दर्द होना इत्यादि।
लुपस एक ऑटोइम्यून बीमारी है। लेकिन इसके बारे में लोगों में बहुत ज्यादा अवेयरनेस नहीं है, जिस वजह से कई बार इसे इग्नोर कर दिया जाता है। और बाद में स्थिति गंभीर हो जाती है ।
इस बीमारी का खतरा किशोरावस्था से लेकर 30 साल तक की उम्र की महिलाओं को ज्यादा होता है।
लुपस फाउंडेशन ऑफ़ अमेरिका के अनुसार लुपस से पीड़ित लगभग 90% मरीज महिलाएं हैं और यह बीमारी आमतौर पर प्रसव के दौरान विकसित होती है। इस लैंगिक असमानता के कर्म को पूरी तरह से समझा नहीं जा सका है ,लेकिन शोधकर्ताओं का मानना है कि हार्मोनल और आनुवंशिक कारक भूमिका निभा सकते हैं।
इसीलिए लुपस बीमारी के प्रति जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से प्रत्येक वर्ष 10 मई को विश्व में लुपस दिवस मनाया जाता है।
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