जानिए हिमाचल प्रदेश की कशिश से संस्कृत दिवस के बारे में।
बाल लेखिका कशिश।
31अगस्त को विश्व संस्कृत दिवस है। हमारी संस्कृति में संस्कृत भाषा के प्राचीनतम भाषा होने की वजह से यह दिन मनाया जाता है। हमारी धार्मिक संस्कृति में इसे देव भाषा कहा जाता है। संस्कृत लगभग सभी वेदों और पुराणों की भाषा है। इसलिए संस्कृत भाषा के प्रति लोग आदर का भाव रखते हैं। हमारे धार्मिक ग्रंथ और मंत्र अधिकतर इसी भाषा में वर्णित है। श्रावणी पूर्णिमा के दिन मनाया जाने वाला संस्कृत दिवस अपने आप में बहुत अनूठा दिन है, क्योंकि किसी भी अन्य प्राचीन भाषा को राष्ट्रीय स्तर पर इस प्रकार नहीं मनाया जाता है।
इस दिन को मनाने का उद्देश्य यह है कि भारतीय धर्म संस्कृति ने संस्कृत को ‘देव भाषा’ का दर्जा दिया गया है, बावजूद इसके यह भाषा अब अपना वजूद खोती जा रही है। अब भारत में भी विदेशी भाषाओं और अंग्रेजी का महत्व बहुत अधिक बढ़ जाने के कारण संस्कृत को पढ़ने वाले, लिखने वाले और समझने वालों की संख्या दिन-प्रतिदिन कम होती जा रही है। इसलिए भारतीय समुदाय या समाज को संस्कृत की महत्ता और आवश्यकता को याद दिलाने और जनमानस में इसका महत्व बढ़ाने के लिए संस्कृत दिवस एवं एवं संस्कृत सप्ताह मनाया जाता है।
इस दिन श्रावणी पूर्णिमा अथवा रक्षाबंधन पर ऋषियों-मुनियों के स्मरण करने तथा उनका पूजन करके समर्पण का भाव रखा जाता है और हमारे ऋषि-मुनि ही संस्कृत साहित्य के आदि स्रोत हैं, अत: श्रावणी पूर्णिमा को संस्कृत दिवस के रूप में मनाया जाता है तथा इसे ऋषि पर्व के रूप में भी मनाया जाता है।
इस दिन को भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय के आदेश से केन्द्रीय तथा राज्य स्तर पर संस्कृत दिवस मनाने का निर्देश सन् 1969 में जारी किया गया था। तभी से संपूर्ण भारत में संस्कृत दिवस को श्रावण पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। इसके लिए श्रावण पूर्णिमा का दिन चुनने का कारण हमारे प्राचीन भारत में इसी दिन शिक्षण सत्र शुरू करने तथा वेद पाठ का शुभारंभ होता था और विद्यार्थी भी इसी दिन से शास्त्रों के अध्ययन का प्रारंभ किया करते थे।
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