लैंगिक भेदभाव खत्म करने के लिए जरूरी है ये पांच बातें – नसीरूद्दीन

जोधपुर में आयोजित मीडिया कार्यशाला में इन संदेशों पर दिया विशेष जोर …

ओमप्रकाश ढाका।

 फ्यूचर सोसाइटी और यूनिसेफ की नई पहल ” जेंडर सेंसिटिव राजस्थान ” के तहत 20 दिसम्बर को लैंगिक संवेदनशीलता बढ़ाने के लिए मीडिया कार्यशाला का आयोजन सूर्यनगरी जोधपुर में हुआ। इस विशेष प्रशिक्षण सत्र में वरिष्ठ जेंडर विषय विशेषज्ञ और शिक्षाविद् नसीरूद्दीन ने अपने 2 घंटे से ज्यादा चले प्रशिक्षण सत्र में बताया कि हमारा समाज लड़के और लड़की में जो फर्क दिखाता है वो तथ्यों से परे है। उन्होंने फ्यूचर सोसाइटी को इस पहल के लिए बधाई दी साथ ही कहा जरुरत इस बात की है कि मीडिया के साथी पत्रकार समाज द्वारा थोपी गई अवधारणाओं को बदले और ये तभी संभव होगा जब पत्रकार अपनी ख़बर से अपने गांव और जिले में लोगों को ये समझाने में सफल हो कि स्त्री और पुरूष दोनों समान होते है।

आरटीडीसी होटल ” घूमर” जोधपुर के प्रशिक्षण सत्र में नसीरुद्दीन ने मौजूद पत्रकार साथियों को विस्तार से समझाया कि आज भी हमारा समाज लड़कियों को ये सिखाता है कि तेज मत बोलो, ऊंची आवाज में बात मत करो, ज्यादा मत बोलो, अकेली बाहर मत जाओ, किसी के साथ बाहर मत जाओ, अपनी मर्जी से किसी से दोस्ती मत करो, अपनी मर्जी से किसी से शादी मत करो, अपने दिमाग से मत सोचो, जैसा कहा जाए वैसा करो, सिर झुकाकर चलो, कंधे झुकाकर चलो, गर्दन मिलाकर बात मत करो आदि।

स्कूल में पढ़ती हुई 10 से 21 वर्ष तक लड़की पर बहुत सारी पाबंदियां होती है इसलिए लड़कियों का विकास नहीं हो पाता है। लड़को और लड़कियों में एक भेदभाव है जो दोनों की परवरिश एक खास तरीके से कर रहा है। जिस प्रकार लड़कियों की परवरिश हो रही है वैसे लड़को की नहीं हो रही है। उन्होंने आगे समझाया कि जब बच्चा पैदा होता है तो लड़का और लड़की समान रूप से पैदा होते है। जब बात पेशे की आती है तो भी समाज में स्त्री – पुरुष में असमानता दिखती है लेकिन असल में पेशा स्त्री पुरुष का बांटा हुआ नही है। हमें समाज को देखने का नजरिया बदलना पड़ेगा। जब सन 1947 में हमें आजादी मिली थी तो हमनें एक ऐसे संविधान का निर्माण किया था जिसमें हमने अपने आप से वादा किया था कि हम भारत के लोग समता, समानता और न्याय की बात करेंगे और यहां लैंगिक भेदभाव नहीं होगा लेकिन आज हम देखते है कि हमारा समाज समान नहीं है। आज हमारे समाज में असमानता, गैर बराबरी और भेदभाव की जड़े गहरी है। अब हमें समझना है कि हम इसको किस प्रकार देखते है।

गौरतलब है कि यह मीडिया कार्यशाला इक्वली सेंसिटिव राजस्थान अभियान के तहत आयोजित की गई थी जिसमें जोधपुर संभाग के पत्रकारों ने बड़ी संख्या में हिस्सा लिया और ऐसी कार्यशालाओं को विस्तार देने का सुझाव दिया।

डिजिटल बाल मेला की शुरुआत कोरोना काल में बच्चों की बोरियत को दूर करने के लिए जयपुर के महाराजा सवाई मानसिंह विद्यालय की छात्रा जान्हवी शर्मा द्वारा की गई थी। इसके तहत अभी तक कई अभियानों का आयोजन किया जा चुका है जिसमें “बच्चों की सरकार कैसी हो?” “मैं भी बाल सरपंच” “कौन बनेगा लोकतंत्र प्रहरी” “म्यूजियम थ्रू माय आइज” आदि शामिल हैं।

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