आईए जानते हैं हिमाचल प्रदेश की कशिश से जम्मू-कश्मीर विलय दिवस के बारे में…

आईए जानते हैं हिमाचल प्रदेश की कशिश से जम्मू-कश्मीर विलय दिवस के बारे में।

 

बाल लेखिका कशिश।

 

जम्मू-कश्मीर विलय दिवस हर साल 26 अक्टूबर को मनाया जाता है. इस दिन को केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर में सार्वजनिक अवकाश घोषित किया जाता है. साल 1947 में इसी दिन जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने भारत के साथ विलय के दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर किए थे. इस दस्तावेज़ को इंस्ट्रुमेंट ऑफ़ एक्सेशन कहा जाता है

जब भारत आजाद हो रहा था तब ब्रिटिश राज ने सभी मौजूदा रियासतों और राजतंत्रों के सामने पेशकश की कि वो भौगोलिक स्थितियों के लिहाज से भारत और पाकिस्तान में से किसी एक में अपना विलय कर लें. तब जम्मू और कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने स्वाधीनता की घोषणा कर दी थी, यानी उनका कहना था कि ‘ना तो हम भारत में जुड़ेंगे और न ही पाकिस्तान में, बल्कि अपनी स्वतंत्र पहचान बनाकर रहेंगे.’ हालांकि उसके बाद ऐसी स्थितियां पैदा हुईं कि उन्हें कश्मीर का भारत में विलय करना पड़ा.

महाराजा हरि सिंह 1925 में कश्मीर की गद्दी पर बैठे थे. वह अपना अधिकांश समय बंबई के रेसकोर्स और अपनी रियासत के बड़े जंगलों में शिकार करते हुए बिताया करते थे. कश्मीर में तब उनके सबसे बड़े विरोधी शेख अब्दुल्ला थे. अब्दुल्ला का जन्म शॉल बेचने वाले एक व्यापारी के घर में हुआ था. उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से एम.एससी की थी. पढ़ने में कुशाग्र होने के साथ-साथ वह शानदार वक्ता भी थे. उन्हें अपनी बातें तर्कों, तथ्यों के साथ रखनी आती थी.

शेख अब्दुल्ला ने पहले प्राइवेट स्कूल में टीचर की नौकरी की, फिर सियासत में कूद पड़े. उन्होंने सवाल उठाना शुरू किया कि इस सूबे में मुसलमानों के साथ भेदभाव वाला सलूक क्यों हो रहा है, बहुसंख्यक होते हुए वो नौकरी और दूसरी बातों में पीछे हैं.

1932 में उन्होंने महाराजा के खिलाफ बढ़ रहे असंतोष को आवाज देने के लिए ऑल जम्मू-कश्मीर मुस्लिम कांफ्रेंस का गठन किया. छह साल के बाद उन्होंने इसका नाम बदलकर नेशनल कॉन्फ्रेंस रख लिया, जिसमें हिंदू और सिख समुदाय के लोग भी शामिल होने लगे. इसी समय अब्दुल्ला ने जवाहरलाल नेहरू से भी नजदीकी बढ़ाई. दोनों हिंदू-मुस्लिम एकता और समाजवाद पर एकमत थे. नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस में नजदीकियां होने लगीं।

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