सिरमौर की कशिश ने बताया भारतीय संस्कृति में महिलाओं का महत्त्व…

जब भी सब्र का बाँध टूटे , तो सब पर भरी नारी

फूल जैसी कोमल नारी , कांटो जितनी कठोर नारी।।

बाल लेखिका कशिश 

भारतीय संस्कृति में नारी की महत्ता से भला कौन परिचित नहीं है। भारतीय संस्कृति में भगवान शिव को भी अर्धनारीश्वर बताया गया है। यह पौराणिक बात इस समाज में महिलाओं की पुरुषों के साथ बराबर भागीदारी की बात सुनिश्चित करती है। श्रेष्ठ कार्यों में महिलाओं को पुरुषों के दाहिनी और बैठाने के पीछे भी महिलाओं को श्रेष्ठ कार्यों में प्राथमिकता देने का विचार निहित है। स्मग्र विकास में महिलाओं की अनिवार्य भागीदारी की आव्यशक्ता पर ये तथ्य बल देते हैं।

कृषि और ग्रामीण विकास को बढ़ाने और महत्वपूर्ण क्षेत्रों में ग्रामीण महिलाओं की अनिवार्य भूमिका को बढ़ाने के लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 2007 में इस दिवस की स्थापना की गई थी। पहली बार यह दिवस 15 अक्टूबर,2008 को मनाया गया था।

इस वर्ष अंतर्राष्ट्रीय ग्रामीण महिला दिवस का विषय/थीम:

“rural women cultivating good food for all” है।

भारत को गांवों का देश माना जाता है। अतः भारत के विकास हेतु आवश्यक है कि गांवों का भी विकास हो।महिला जनप्रतिनिधित्व द्वारा ही ग्रामीण विकास की बात करने के पीछे तर्क ये है की भारत में महिलाओं की आबादी 68.5 करोड़ है, जोकि भारत की कुल जनसंख्या का 48% है।

अतः इतनी बड़ी जनशक्ति होने से ग्रामीण महिलाओं को प्रतिनिधित्व बनाना आव्यश्क है।ग्रामीण महिलाओं के जनप्रतिनिधि बनने से न केवल महिलाओं की जनभागीदारी बड़ेगी,अपितु उनमें अतमनिर्भरता और आत्मबल का विकास भी होगा।

ग्रामीण महिलाओं को शिक्षा में भी सशक्त बनाने की आव्यशकता है,यदि ग्रामीण महिलाएं शिक्षित होंगी तो उनके साथ साथ पूरा गांव विकसित हो जायेगा।

यदि ग्रामीण महिलाएं शिक्षित होगी ,तो इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में भी बड़ोतरी होगी।ग्रामीण महिलाएं सरकार द्वारा संचालित योजनाओं और नीतियों का भरपूर लाभ उठा पाएगी।

महिलाओं को आगे लाने के लिए उन्हें शिक्षित,आर्थिक रूप से मजबूत और आतमनिर्भर बनना होगा।इसके लिए महिलाओं को स्वयं भी अपने अधिकारों के प्रति सचेत होना होगा और पुरुषों को भी महिलाओं को प्रत्येक क्षेत्र में आगे लाने के लिए सहयोग करना होगा।किसी भी त्रुटि, कमी या आलोचना की परवाह किए बिना ही महिला प्रतिनिधित्व को विकास की प्रक्रिया जारी रखनी चाहिए,तभी सही अर्थों में ग्रामीण विकास सुनिश्चित हो पाएगा।

डिजिटल बाल मेला बच्चों के बीच जागरूकता पैदा करने और उनकी कला को प्रदर्शित करने के लिए बच्चों द्वारा स्थापित एक मंच है।

डिजिटल बाल मेला ने सितंबर एवं अक्तूबर माह के महत्वपूर्ण दिनों पर एक लेखन प्रतियोगिता का आयोजन किया है। प्रतियोगिता के अंत में जिस बच्चे की लेखन कला सबसे अच्छी होगी उसे 1100 रुपये का नकद पुरस्कार भी दिया जाएगा। आप भी इसमें भाग ले सकते हैं। आपके द्वारा लिखे गए लेख डिजिटल बाल मेला में भेजें। बाल लेखकों द्वारा लिखे गए आलेखों को उनकी फोटो के साथ डिजिटल बाल मेला की वेबसाइट पर पोस्ट किया जाएगा।

डिजिटल बाल मेला बच्चों के लिए अपनी प्रतिभा और रचनात्मकता दिखाने का एक अभिनव मंच है। इसकी शुरुआत 2020 में जयपुर की 10 वर्षीय लड़की जान्हवी शर्मा ने की थी। डिजिटल बाल मेला ने अब तक कई अभियान चलाए हैं जिनमें “राजस्थान विधानसभा बाल सत्र”, “हिमाचल प्रदेश विधानसभा बाल सत्र”, “मैं भी” शामिल हैं। बाल सरपंच” आदि।

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