टॉक मॉडल पब्लिक स्कूल के छात्र दिनेश सहारण ने हनुमानगढ़ जिले की विशेषताओं के बारे में जानकारी दी।

हनुमानगढ़ जिले की नोहर तहसील में स्थित गोगामेड़ी धाम राजस्थान का एक ऐसा चमत्कारी और अनोखा धाम है जहाँ हिंदू-मुस्लिम एकता की जीवंत मिसाल देखने को मिलती है। यह धाम लोकदेवता गोगाजी महाराज को समर्पित है, जिन्हें जहरीले सांपों के देवता, जाहरवीर, गुग्गा वीर और जाहर पीर के नाम से भी जाना जाता है। कहा जाता है कि लगभग 950 साल पहले चूरू के ददरेवा गांव में राजा जेवर और रानी बाछल के घर गुरु गोरखनाथ के आशीर्वाद से गोगाजी का जन्म हुआ था। वे नाथ सम्प्रदाय के सिद्ध योगी बने और गौ-रक्षा और जनता की रक्षा के लिए महमूद गजनवी से युद्ध करते हुए उन्होंने वीरगति प्राप्त की थी। इसीलिए उनकी समाधि पर बना यह मंदिर आज भी शौर्य, त्याग और धर्म का प्रतीक माना जाता है।

इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता इसकी वास्तुकला और परंपराएँ हैं। एक ऊँचे टीले पर बना यह मंदिर हिंदू और मुस्लिम स्थापत्य कला का अद्भुत संगम है, जिसका जीर्णोद्धार 1911 में बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह ने करवाया था। मंदिर के प्रवेश द्वार पर बिस्मिल्लाह लिखा है तो गर्भगृह में नीले घोड़े पर सवार, हाथ में भाला और गले में सांप लपेटे हुए गोगाजी की वीर मूर्ति है। यहाँ ग्यारह महीने मुस्लिम पुजारी और भादवा मेले के एक महीने हिंदू पुजारी पूजा करते हैं। पूरे भारत में यह एकमात्र ऐसा मंदिर है जहाँ प्रसाद के रूप में प्याज और दाल चढ़ाई जाती है। इसके पीछे मान्यता है कि गोगाजी की सेना युद्ध के समय अपने साथ प्याज और दाल ही राशन के रूप में लाई थी, और उनके शहीद होने के बाद सैनिकों ने श्रद्धा में वही उनकी समाधि पर अर्पित कर दिया था।

हर साल भाद्रपद महीने में गोगा नवमी से शुरू होने वाला गोगामेड़ी का मेला राजस्थान के सबसे बड़े मेलों में से एक है, जिसमें राजस्थान, हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश से लाखों श्रद्धालु आते हैं। मेले में गले में सांप डाले हुए लोगों को देखना आम बात है क्योंकि लोगों का अटूट विश्वास है कि गोगाजी की पूजा करने से कभी भी सांप नहीं काटता। प्याज से मंदिर में टनों में इकट्ठा होने वाले प्रसाद को बेचकर मंदिर प्रशासन रोज भंडारा और गौशाला चलाता है। सच में गोगामेड़ी धाम सिर्फ एक तीर्थ स्थल नहीं है, बल्कि यह संदेश देता है कि भक्ति का कोई मजहब नहीं होता और इंसानियत ही सबसे बड़ा धर्म है।

डिजिटल बाल मेला की संस्थापक जान्हवी शर्मा ने बताया कि जोधपुर बाल महोत्सव बच्चों को संस्कृति से जोड़ने का एक प्रयास है। इसमें भाग लेने के लिए 12 से 18 वर्ष के बच्चे और युवा डिजिटल बाल मेला की वेबसाइट digitalbaalmela.com और व्हाट्सऐप 8005915026 पर फ्री रजिस्ट्रेशन कर सकते हैं। विजेताओं को ढेरों इनाम और जोधपुर घूमने का मौका मिलेगा।

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